رَّبِّ اَعُوۡذُ بِکَ مِنۡ ھَمَزٰتِ الشَّیٰطِیۡنِ ۙ واَعُوۡذُ بِکَ رَبِّ اَنۡ یَّحۡضُرُوۡن ؕ۔
بِسۡمِ اللّٰهِ الرَّحۡمٰنِ الرَّحِيۡمِۙ۔
इस्लाम का परिचय
वास्तव में! इस्लाम का परिचय हर जीवित प्राणी की छाती में धड़कते दिल की धड़कन की प्रकृति में ही निहित है। लेकिन अधिकांश दिल गुमराहियों के परदों में लिपटे हुए हैं। अत: अल्लाह तआला इन गुमराहियों के परदों को हटाने की मेरी कोशिश को क़बूल फ़रमाए। आमीन।
"जब कोई बंदा अपने सृष्टिकर्ता और समस्त ब्रह्मांडों के सृष्टिकर्ता की सच्चे मन से ईबादत करता है, उसके धर्म के सीधे मार्ग पर चलता है, नेक कर्म करता है, नमाज़ कायम करता है और ज़कात अदा करता है, तो यही सीधा, सच्चा और चिरस्थायी धर्म ‘इस्लाम’ है।"
فَاَقِمۡ وَجۡهَكَ لِلدِّيۡنِ حَنِيۡفًا ؕ فِطۡرَتَ اللّٰهِ الَّتِىۡ فَطَرَ النَّاسَ عَلَيۡهَا ؕ لَا تَبۡدِيۡلَ لِخَـلۡقِ اللّٰهِ ؕ ذٰ لِكَ الدِّيۡنُ الۡقَيِّمُ ۙ وَلٰـكِنَّ اَكۡثَرَ النَّاسِ لَا يَعۡلَمُوۡنَ ۙ ﴿۳۰﴾ مُنِيۡبِيۡنَ اِلَيۡهِ وَاتَّقُوۡهُ وَاَقِيۡمُوا الصَّلٰوةَ وَلَا تَكُوۡنُوۡا مِنَ الۡمُشۡرِكِيۡنَۙ ﴿۳۱﴾
Q-30:30-31इसलिए, सच्चे और सही धर्म—यानी "सत्य के मार्ग" —पर अडिग रहो। यही वह स्वभाव है जिस पर अल्लाह ने इंसानियत को बनाया है। अल्लाह के बनाए इस स्वभाव ("सत्य के मार्ग") में कोई बदलाव नहीं होता। यही सच्चा धर्म है, फिर भी ज़्यादातर लोग इसे नहीं जानते। (30) उसी एकेश्वर की ओर मुड़ो, उससे डरो, नमाज़ कायम करो और बहुदेववाद में शामिल न होओ। (31)
وَمَاۤ اُمِرُوۡۤا اِلَّا لِيَعۡبُدُوا اللّٰهَ مُخۡلِصِيۡنَ لَـهُ الدِّيۡنَ ۙ حُنَفَآءَ وَيُقِيۡمُوا الصَّلٰوةَ وَيُؤۡتُوا الزَّكٰوةَ وَذٰلِكَ دِيۡنُ الۡقَيِّمَةِ ؕ ﴿۵﴾
Q-98:05और उन्हें तो बस यही आदेश दिया गया था कि वे खुदा की इबादत करें, उसके प्रति निष्ठावान रहें, उसके सीधे मार्ग पर चलें, नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें, और यही सच्चा और स्थायी धर्म है।
فَسَاَكۡتُبُهَا لِلَّذِيۡنَ يَتَّقُوۡنَ وَيُؤۡتُوۡنَ الزَّكٰوةَ وَالَّذِيۡنَ هُمۡ بِاٰيٰتِنَا يُؤۡمِنُوۡنَ ۚ ﴿۱۵۶﴾
Q-07:156खुदा अपनी रहमत (दयालुता) उन लोगों के लिए लिख देता है जो उससे डरते हैं और ज़कात देते हैं और अल्लाह की आयतों पर ईमान लाते हैं।
رَّبُّ السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضِ وَمَا بَيۡنَهُمَا فَاعۡبُدۡهُ وَاصۡطَبِرۡ لِـعِبَادَتِهٖؕ هَلۡ تَعۡلَمُ لَهٗ سَمِيًّا ﴿۶۵﴾
Q-19:65आकाश और पृथ्वी और उनके बीच जो कुछ भी है, उसके स्वामी की ईबादत (पूजा) करो। और उसकी ईबादत में धैर्य (सब्र) रखो। क्या तुम उसके समान किसी को जानते हो?
وَاِنَّ اللّٰهَ رَبِّىۡ وَرَبُّكُمۡ فَاعۡبُدُوۡهُ ؕ هٰذَا صِرَاطٌ مُّسۡتَقِيۡمٌ ﴿۳۶﴾
Q-19:36और निःसंदेह, अल्लाह ही मेरा और तुम्हारा रब है, इसलिए उसी की ईबादत करो। यही सीधा मार्ग है।
आरंभ से अंत तक केवल इस्लाम।
ईश्वर का यह धर्म उस दिन अस्तित्व में आया जब आदम (As) और माँ हव्वा को पृथ्वी पर लाया गया। हाँ, शरिया (धर्म का मार्ग) भिन्न था। उदाहरण के लिए, नमाज़ का कोई आदेश नहीं था, या हो सकता है कि पूजा का कोई अस्तित्व ही न रहा हो। लोगों की ईमानदारी, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और अच्छे कर्म—या कुछ अवसरों पर ईश्वर के लिए बलिदान अर्पित करना—पुरस्कार और दंड का आधार रहा हो।
शुरुआत में, सभी मनुष्य एक ही मार्ग पर थे। यानी खुदा की हिदायत (मार्ग) पर। यानी एक खुदा की शुक्रगुज़ारी और पैरवी। लेकिन जैसे-जैसे लोग बढ़ने लगे, उनके बीच मतभेद और अलग-अलग राय पैदा होने लगीं। ऐसे समय में, खुदा ने हिदायत (मार्गदर्शन) और शरीयत (आदेश) लेकर नबियों को भेजना शुरू किया। लेकिन सच्चाई स्पष्ट होने के बाद भी, लोगों में हठ और अहंकार के कारण मतभेद बढ़ने लगे।
अल्लाह के आज्ञाकारी बंदों को अरबी में मुसलमान (विनम्र) कहा जाता है। आदम (As) से लेकर पैगंबर मुहम्मद (SAW) तक, सभी पैगंबर और उनके नेक अनुयायी, चाहे उन्हें उनके समय की भाषा में किसी भी नाम से पुकारा गया हो, अरबी भाषा में सभी मुसलमान कहलाएंगे। चाहे वे यहूदी हों, ईसाई हों, सबाई हों या किसी अन्य नबी के अनुयायी हों। लेकिन शर्त यह है कि वे एक ईश्वर पर विश्वास रखते हों। यानी राह ए रास्त (सदमार्ग) पर चलने वाले हों।
وَمَاۤ اَرۡسَلۡنَا مِنۡ قَبۡلِكَ مِنۡ رَّسُوۡلٍ اِلَّا نُوۡحِىۡۤ اِلَيۡهِ اَنَّهٗ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّاۤ اَنَا فَاعۡبُدُوۡنِ ﴿۲۵﴾
Q-21:25और हमने तुमसे पहले कोई ऐसा रसूल नहीं भेजा, जिस पर यह वही प्रकट न हुई हो कि! "मेरे सिवा कोई मआबूद नहीं, इसलिए मेरी ईबादत करो।
كَانَ النَّاسُ اُمَّةً وَّاحِدَةً فَبَعَثَ اللّٰهُ النَّبِيّٖنَ مُبَشِّرِيۡنَ وَمُنۡذِرِيۡنَ وَاَنۡزَلَ مَعَهُمُ الۡكِتٰبَ بِالۡحَـقِّ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَ النَّاسِ فِيۡمَا اخۡتَلَفُوۡا فِيۡهِ ؕ وَمَا اخۡتَلَفَ فِيۡهِ اِلَّا الَّذِيۡنَ اُوۡتُوۡهُ مِنۡۢ بَعۡدِ مَا جَآءَتۡهُمُ الۡبَيِّنٰتُ بَغۡيًا ۢ بَيۡنَهُمۡۚ فَهَدَى اللّٰهُ الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا لِمَا اخۡتَلَفُوۡا فِيۡهِ مِنَ الۡحَـقِّ بِاِذۡنِهٖ ؕ وَاللّٰهُ يَهۡدِىۡ مَنۡ يَّشَآءُ اِلٰى صِرَاطٍ مُّسۡتَقِيۡمٍ ﴿۲۱۳﴾
Q-02:213आरंभ में समस्त मानवजाति एक ही मार्ग (सदमार्ग) पर थी। फिर अल्लाह ने पैगंबरों को खुशखबरी और चेतावनी देने के लिए भेजा और उनके साथ पवित्र किताबें अवतरित की, ताकि वे लोगों के बीच विवादों का निपटारा कर सकें। परन्तु जिन लोगों को पुस्तक दी गई, वे सत्य प्रकट होने के बाद भी अपने विद्रोह और हठधर्मिता के कारण आपस में मतभेद (इखतलाफ़) करने लगे। तब अल्लाह ने अपने आदेश से विश्वासियों को उनके मतभेदों में मार्गदर्शन दिया। और अल्लाह जिसे चाहता है, उसे सदमार्ग (हिदायत के मार्ग) पर चला देता है।
شَرَعَ لَـكُمۡ مِّنَ الدِّيۡنِ مَا وَصّٰى بِهٖ نُوۡحًا وَّالَّذِىۡۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ وَمَا وَصَّيۡنَا بِهٖۤ اِبۡرٰهِيۡمَ وَمُوۡسٰى وَعِيۡسٰٓى اَنۡ اَقِيۡمُوا الدِّيۡنَ وَ لَا تَتَفَرَّقُوۡا فِيۡهِؕ ﴿۱۳﴾
Q-42:13हमने तुम्हारे लिए दीन का वही तरीका निर्धारित किया है जो हमने नूह को सिखाया था और हमने तुम्हारे लिए वही वह्यी उतारी है जो इबराहीम, मूसा और ईसा को प्रदान की थी। धर्म को स्थापित करो और उसमें टुकड़े न करो।
اِذۡ قَالَ لَهٗ رَبُّهٗۤ اَسۡلِمۡۙ قَالَ اَسۡلَمۡتُ لِرَبِّ الۡعٰلَمِيۡنَ ﴿۱۳۱﴾ وَوَصّٰى بِهَآ اِبۡرٰهٖمُ بَنِيۡهِ وَ يَعۡقُوۡبُؕ يٰبَنِىَّ اِنَّ اللّٰهَ اصۡطَفٰى لَـكُمُ الدِّيۡنَ فَلَا تَمُوۡتُنَّ اِلَّا وَاَنۡـتُمۡ مُّسۡلِمُوۡنَؕ ﴿۱۳۲﴾ اَمۡ كُنۡتُمۡ شُهَدَآءَ اِذۡ حَضَرَ يَعۡقُوۡبَ الۡمَوۡتُۙ اِذۡ قَالَ لِبَنِيۡهِ مَا تَعۡبُدُوۡنَ مِنۡۢ بَعۡدِىۡؕ قَالُوۡا نَعۡبُدُ اِلٰهَكَ وَاِلٰهَ اٰبَآٮِٕكَ اِبۡرٰهٖمَ وَاِسۡمٰعِيۡلَ وَاِسۡحٰقَ اِلٰهًا وَّاحِدًا ۚ وَّنَحۡنُ لَهٗ مُسۡلِمُوۡنَ ﴿۱۳۳﴾
Q-02:131-133जब इब्राहीम के रब ने उससे कहा, "इस्लाम स्वीकार करो," तो उसने कहा, "मैं सारे संसार के रब का फ़रमाबरदार हो गया हूँ।" (131) फिर इब्राहीम ने अपने बेटों को भी यही हुक्म दिया, फिर याकूब ने कहा, "ऐ मेरे बेटों! अल्लाह ने तुम्हारे लिए यही धर्म चुन लिया है। अतः यदि तुम्हें मौत आए, तो मुसलमान रहते हुए ही मरना। (132)
क्या तुम उस समय उपस्थित थे जब याकूब की मृत्यु हुई? जब उसने अपने पुत्रों से कहा, ‘मेरे बाद तुम किसकी उपासना करोगे?’ उन्होंने कहा, ‘हम तुम्हारे खुदा और तुम्हारे पूर्वजों, इब्राहीम, इस्माइल और इसहाक के खुदा की ईबादत करेंगे, जो यकता है। और हम उसी के फर्माबरदार अथार्थ मुसलमान हैं (133)।
ईश्वर का सच्चा धर्म इस्लाम है।
समय चाहे जो भी हो, पैगंबर, संदेशवाहक और उनके अनुयायी समय की चादर में लिपटते रहे। लेकिन खुदा (ईश्वर) का धर्म, जो आरंभ में था, क़यामत के दिन तक अपरिवर्तित रहेगा। मनुष्य अपने हठ और अहंकार में धार्मिक संप्रदायों को गढ़ता है। और स्वयं पर अत्याचार करता है।
अलग-अलग भाषाओं में, खुदा को ईश्वर या अल्लाह, यहोवा या एल, एलोहिम या अदोनाई, ईश्वर या पिता, प्रभु या रहमान या रहीम कहकर पुकारा जाता है। ये सभी विभिन्न कालों और विभिन्न भाषाओं में खुदा के ही नाम हैं। एक निश्चित समय के बाद, सभी एक ही ईश्वर के दरबार में खड़े होंगे। तोराह, भजन संहिता (ज़बूर), इंजील और कुरान एक दूसरे की पुष्टि करने वाले पवित्र ग्रंथ हैं। प्रत्येक ग्रंथ अपने से पहले वाले ग्रंथ का अपडेट संस्करण है।
प्रत्येक मनुष्य जानता है कि समय के साथ प्रगति प्रकृति का नियम है। ईश्वर ने भी समय के साथ अपने ग्रंथों और नियमों को अपडेट किया। तो क्या ईश्वर के बंदों का यह कर्तव्य नहीं है कि वे ईश्वर की पुस्तकों के अपडेट संस्करण को कम से कम एक बार पढ़ने का कष्ट उठाएं, बजाय इसके कि वे उनसे नफरत करें?
सोचो! क्या ईश्वर का उद्देश्य एक के बाद एक नबी भेजना अपने बंदों को ज्ञान से अवगत रखना नहीं था? एक बात भली-भांति जान लो, ईश्वर उन्हीं को प्राप्त होता है जो प्रयास करते हैं।
मैं हर धर्मग्रंथ (अहले किताब) के अनुयायी से कहता हूँ कि ईश्वर के पास तुम्हारा धर्म, इस्लाम है। भले ही आप अपने धर्म अपडेट न करो, परन्तु खुदा के अपडेट ग्रंथ ‘कुरान’ का एक बार अध्ययन अवश्य करो। ईश्वर प्रयास करने वालों को निराश नहीं करता।
وَمَا جَعَلَ عَلَيۡكُمۡ فِى الدِّيۡنِ مِنۡ حَرَجٍؕ مِلَّةَ اَبِيۡكُمۡ اِبۡرٰهِيۡمَؕ هُوَ سَمّٰٮكُمُ الۡمُسۡلِمِيۡنَ ۙ مِنۡ قَبۡلُ وَفِىۡ هٰذَا لِيَكُوۡنَ الرَّسُوۡلُ شَهِيۡدًا عَلَيۡكُمۡ وَتَكُوۡنُوۡا شُهَدَآءَ عَلَى النَّاسِۚ ﴿۷۸﴾
Q-22:78उसने (ईश्वर ने) धर्म के मामले में तुम पर कोई कठिनाई नहीं डाली है। यह तुम्हारे पिता इब्राहीम का धर्म है। उसने तुम्हें पहले भी और इस (कुरान) में भी मुसलमान नाम दिया है ताकि पैगंबर तुम पर गवाह हों और तुम लोगों पर गवाह बनो।
مَا كَانَ اِبۡرٰهِيۡمُ يَهُوۡدِيًّا وَّلَا نَصۡرَانِيًّا وَّلٰكِنۡ كَانَ حَنِيۡفًا مُّسۡلِمًا ؕ وَمَا كَانَ مِنَ الۡمُشۡرِكِيۡنَ ﴿۶۷﴾
Q-03:67इब्राहीम (As) न तो यहूदी थे और न ही ईसाई। वे सदमार्ग पर चलते थे, जो सीधे अल्लाह की ओर जाता था। वे अल्लाह के आदेशों से बंधे एक सच्चे मुसलमान थे और उनका मुशरीकों (बहुदेववादियों) से कोई संबंध नहीं था।
اِنَّ الدِّيۡنَ عِنۡدَ اللّٰهِ الۡاِسۡلَامُ وَمَا اخۡتَلَفَ الَّذِيۡنَ اُوۡتُوا الۡكِتٰبَ اِلَّا مِنۡۢ بَعۡدِ مَا جَآءَهُمُ الۡعِلۡمُ بَغۡيًا ۢ بَيۡنَهُمۡؕ وَمَنۡ يَّكۡفُرۡ بِاٰيٰتِ اللّٰهِ فَاِنَّ اللّٰهَ سَرِيۡعُ الۡحِسَابِ ﴿۱۹﴾
Q-03:19अल्लाह की दृष्टि में सच्चा और स्वीकार्य धर्म इस्लाम है। जिन्हें किताब (आकाशीय शिक्षाएँ) दी गईं, उन्होंने ज्ञान प्राप्त होने के बाद केवल ज़िद (हठ) और ईर्ष्या के कारण मतभेद किया। जो कोई अल्लाह की आयतों को नकारता है, तो निःसंदेह अल्लाह शीघ्र ही उसका हिसाब लेगा।
وَمَنۡ يَّبۡتَغِ غَيۡرَ الۡاِسۡلَامِ دِيۡنًا فَلَنۡ يُّقۡبَلَ مِنۡهُ ۚ وَهُوَ فِى الۡاٰخِرَةِ مِنَ الۡخٰسِرِيۡنَ ﴿۸۵﴾
Q-03:85और जो कोई इस्लाम के सिवा किसी और धर्म को अपना धर्म मानता है, वह कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा, और परलोक में वह हानि उठाने वालों में से होगा।
इस्लाम के आधार।
प्राचीन काल से ही इस्लाम के दो मूलभूत आधार रहे हैं।
पहला स्थायी आधार। “अल्लाह की सुन्नत”।
किसी भी पैगंबर या रसूल के लिए जो बात कभी नहीं बदली, वह है अल्लाह की सुन्नत, अथार्थ لَا اِلَہٰ اِلا اللّٰہ (अल्लाह के सिवा कोई पूजा योग्य नहीं)। अल्लाह सर्वशक्तिमान अपने बंदों को आदेश देता है कि वे सच्चे मन से अल्लाह की इस सुन्नत का पालन करते हुए उसकी ईबादत करें।
وَمَاۤ اَرۡسَلۡنَا مِنۡ قَبۡلِكَ مِنۡ رَّسُوۡلٍ اِلَّا نُوۡحِىۡۤ اِلَيۡهِ اَنَّهٗ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّاۤ اَنَا فَاعۡبُدُوۡنِ ﴿۲۵﴾
Q-21:25और हमने तुमसे पहले कोई ऐसा नबी नहीं भेजा जिसको यह न बताया हो कि: "मेरे सिवा कोई ईश्वर नहीं, इसलिए मेरी उपासना (ईबादत) करो।
شَرَعَ لَـكُمۡ مِّنَ الدِّيۡنِ مَا وَصّٰى بِهٖ نُوۡحًا وَّالَّذِىۡۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ وَمَا وَصَّيۡنَا بِهٖۤ اِبۡرٰهِيۡمَ وَمُوۡسٰى وَعِيۡسٰٓى اَنۡ اَقِيۡمُوا الدِّيۡنَ وَ لَا تَتَفَرَّقُوۡا فِيۡهِؕ ﴿۱۳﴾
Q-42:13उसने तुम्हारे लिए वह धर्म निर्धारित किया है जो उसने नूह पर अनिवार्य किया था, और जो हमने तुम पर भी वहीय (प्रकट) किया, और जो हमने इब्राहीम, मूसा और ईसा पर अनिवार्य किया था। यात: धर्म को स्थापित करो, और उसमें कोई विभाजन न करो।
قُلۡ اِنَّمَاۤ اُمِرۡتُ اَنۡ اَعۡبُدَ اللّٰهَ وَلَاۤ اُشۡرِكَ بِهٖؕ اِلَيۡهِ اَدۡعُوۡا وَاِلَيۡهِ مَاٰبِ ﴿۳۶﴾
Q-13:36कहो, हे मुहम्मद! “मुझे केवल अल्लाह की ही ईबादत करने का आदेश दिया गया है, और उसके साथ किसी को शरीक न करने का। मैं उसी की ओर पुकारता हूँ, और मुझे उसी की तरफ लौटना है।
وَمِنۡ اٰيٰتِهِ الَّيۡلُ وَالنَّهَارُ وَالشَّمۡسُ وَالۡقَمَرُؕ لَا تَسۡجُدُوۡا لِلشَّمۡسِ وَلَا لِلۡقَمَرِ وَاسۡجُدُوۡا لِلّٰهِ الَّذِىۡ خَلَقَهُنَّ اِنۡ كُنۡتُمۡ اِيَّاهُ تَعۡبُدُوۡنَ ﴿۳۷﴾
Q-41:36और उसकी निशानियों में रात, दिन, सूरज और चाँद शामिल हैं। सूरज और चाँद को सजदा मत करो, बल्कि अल्लाह को सजदा करो, जिसने इन्हें पैदा किया है, अगर तुम उसी की इबादत करते हो।
दूसरा अस्थायी आधार, “अल्लाह की शरीयत अथार्थ संविधान”।
जो समय और आवश्यकता के अनुसार अपडेट (अद्यतन) होता रहा, वह अल्लाह की शरीयत (अल्लाह के आदेश) हैं। अर्थात्, जिस प्रकार मनुष्य समय और आवश्यकता के अनुसार अपडेट होता रहा, उसी प्रकार अल्लाह सर्वशक्तिमान ने अपने नबियों पर नई शरीयत जारी की ताकि वह आज्ञाकारी विश्वासियों और बहुदेववादियों एवं अविश्वासियों के बीच न्याय कर सके।
वास्तव में, ईश्वर ने समस्त सृष्टि में से मनुष्यों और जिन्नों को कानून का पालन करने के लिए चुना। और उन्हें चुनाव की स्वतंत्रता भी दी। रास्तबाज़ी का रास्ता चुनने या फिर कुफ्र का रास्ता? अल्लाह सर्वशक्तिमान ने चार महान ग्रंथों, तोराह, भजन संहिता, इंजील और कुरान, तथा बहुत सी पांडुलिपियों का ज़िक्र किया है।
اِنَّا عَرَضۡنَا الۡاَمَانَةَ عَلَى السَّمٰوٰتِ وَالۡاَرۡضِ وَالۡجِبَالِ فَاَبَيۡنَ اَنۡ يَّحۡمِلۡنَهَا وَاَشۡفَقۡنَ مِنۡهَا وَ حَمَلَهَا الۡاِنۡسَانُؕ اِنَّهٗ كَانَ ظَلُوۡمًا جَهُوۡلًا ۙ ﴿۷۲﴾ لِّيُعَذِّبَ اللّٰهُ الۡمُنٰفِقِيۡنَ وَالۡمُنٰفِقٰتِ وَالۡمُشۡرِكِيۡنَ وَالۡمُشۡرِكٰتِ وَيَتُوۡبَ اللّٰهُ عَلَى الۡمُؤۡمِنِيۡنَ وَالۡمُؤۡمِنٰتِؕ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُوۡرًا رَّحِيۡمًا ﴿۷۳﴾
Q-33:72-73निस्संदेह, हमने आकाशों, पृथ्वी और पहाड़ों को अमानत (शरीयत) पेश की, परन्तु उन्होंने इसे उठाने से इनकार कर दिया और इससे भयभीत हो गए। और मनुष्य ने इसे उठा लिया। वह ज़ालिम और अज्ञानी था। (72) ताकि अल्लाह मुनाफिक पुरुष और मुनाफिक स्त्री तथा बहुदेववादी पुरुष और बहुदेववादी स्त्री को दंडित करे, और अल्लाह मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्री को क्षमा करे। और अल्लाह माफ करने वाला और दयालु है। (73)
وَمَا كَانَ لِرَسُوۡلٍ اَنۡ يَّاۡتِىَ بِاٰيَةٍ اِلَّا بِاِذۡنِ اللّٰهِ ؕ لِكُلِّ اَجَلٍ كِتَابٌ (۳۸) يَمۡحُوۡا اللّٰهُ مَا يَشَآءُ وَيُثۡبِتُ ۖ ۚ وَعِنۡدَهٗۤ اُمُّ الۡكِتٰبِ ﴿۳۹﴾
Q-13:38-39(अल्लाह सभी नबियों पर अवतरित पुस्तकों और ग्रंथों के विषय में कहते हैं): और किसी भी नबी के लिए अल्लाह की अनुमति के बिना कोई आयत लाना संभव नहीं था। प्रत्येक युग के लिए एक पुस्तक (शरीयत) है। (38) अल्लाह जिस हुक्म को चाहता है निरस्त करता है और जिसको चाहता है संरक्षित करता है, और उसी के पास मूल पुस्तक (लोह ए महफूज़) है। (39)
हज्जातुलविदा के दिन, अल्लाह सर्वशक्तिमान ने पैगंबर मुहम्मद (saw) को "धर्म के पूर्ण" होने की सूचना दी। और कहा: "हमने तुम्हारे लिए इस्लाम को तुम्हारे धर्म के रूप में चुना है।" पवित्र कुरान में, अल्लाह सर्वशक्तिमान ने घोषणा की है कि हज़रत मुहम्मद (saw) अंतिम पैगंबर हैं। अर्थात्, क़यामत के दिन तक कोई और पैगंबर पैदा नहीं होगा और कोई और कानून (संविधान) अवतरित नहीं होगा। कुरान और उसके आदेश शेष समय के लिए अक्षुण्ण रहेंगे क्योंकि वहीय का सिलसिला समाप्त हो चुका है।
اَلۡيَوۡمَ اَكۡمَلۡتُ لَـكُمۡ دِيۡنَكُمۡ وَاَ تۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِىۡ وَرَضِيۡتُ لَـكُمُ الۡاِسۡلَامَ دِيۡنًا ؕ ﴿۳﴾
Q-05:03"आज हमने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को पूर्ण कर दिया है, तुम पर अपनी कृपा पूरी कर दी है, और तुम्हारे लिए इस्लाम को तुम्हारे धर्म के रूप में चुना है।"
مَا كَانَ مُحَمَّدٌ اَبَآ اَحَدٍ مِّنۡ رِّجَالِكُمۡ وَلٰـكِنۡ رَّسُوۡلَ اللّٰهِ وَخَاتَمَ النَّبِيّٖنَ ؕ وَكَانَ اللّٰهُ بِكُلِّ شَىۡءٍ عَلِيۡمًا ﴿۴۰﴾
Q-33:40मुहम्मद (saw) तुम्हारे किसी पुरुष के पिता नहीं हैं, बल्कि वे अल्लाह के रसूल और पैगंबरों में अंतिम हैं। और अल्लाह सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) है।
اِنَّ الدِّيۡنَ عِنۡدَ اللّٰهِ الۡاِسۡلَامُ ﴿۱۹﴾
Q-03:19अल्लाह की दृष्टि में एकमात्र सच्चा और स्वीकार्य धर्म इस्लाम ही है।
ईश्वर अपने बंदों को इस्लाम में आमंत्रित करता है।
अंतिम पैगंबर मुहम्मद (saw) से पहले! याकूब (As) के नस्लों में आने वाले प्रत्येक पैगंबर का एकमात्र उद्देश्य बनी इसराइल को सदमार्ग दिखाना था। यह भी कहा जा सकता है कि खुदा और उसका दीन एक ही परिवार तक सीमित होकर रह गया था। फिर भी समय-समय पर अन्य क़ौमों को भी धर्म के आमंत्रण के संकेत मिलते हैं, परन्तु संसार को एक सार्वभौमिक निमंत्रण प्राप्त नहीं होता।
अल्लाह सर्वशक्तिमान ने मुहम्मद (saw) को संसार के लिए रहमत कहा और उन्हें संसार के समस्त लोगों के लिए पैगंबर नियुक्त किया। ईश्वर पैगंबर (saw) से कहते हैं कि! तुम सभी अहले किताब को दीन (धर्म) की ओर आमंत्रित करो, साथ ही उन सभी को भी जो अभी तक धर्म से अपरिचित हैं।
وَمَاۤ اَرۡسَلۡنٰكَ اِلَّا رَحۡمَةً لِّـلۡعٰلَمِيۡنَ ﴿۱۰۷﴾
Q-21:107और हमने आपको समस्त संसार के लिए रहमत बनाकर भेजा है।
وَمَاۤ اَرۡسَلۡنٰكَ اِلَّا كَآفَّةً لِّلنَّاسِ بَشِيۡرًا وَّنَذِيۡرًا وَّلٰـكِنَّ اَكۡثَرَ النَّاسِ لَا يَعۡلَمُوۡنَ ﴿۲۸﴾
Q-34:28और हमने आपको समस्त मानवजाति के लिए रहमत, खुशखबरी देने वाला और चेतावनी देने वाला बनाकर भेजा है, परन्तु अधिकांश लोग आपको नहीं जानते।
فَقُلۡ اَسۡلَمۡتُ وَجۡهِىَ لِلّٰهِ وَمَنِ اتَّبَعَنِؕ وَقُل لِّلَّذِيۡنَ اُوۡتُوا الۡكِتٰبَ وَالۡاُمِّيّٖنَ ءَاَسۡلَمۡتُمۡؕ فَاِنۡ اَسۡلَمُوۡا فَقَدِ اهۡتَدَوْا ۚ وَاِنۡ تَوَلَّوۡا فَاِنَّمَا عَلَيۡكَ الۡبَلٰغُ ؕ وَاللّٰهُ بَصِيۡرٌۢ بِالۡعِبَادِ ﴿۲۰﴾
Q-03:20अत: तुम कहो! मैंने अपना चेहरा अल्लाह और अपने अनुयायियों के लिये समर्पित कर दिया है। और उन लोगों से कहो जिन्हें किताब दी गई है और उन लोगों से भी जिन्हें किताब नहीं दी गई है: क्या तुम इस्लाम को स्वीकार करते हो? फिर जो कोई इस्लाम को स्वीकार करता है, वह निश्चय ही मार्गदर्शित है। और जो लोग इस्लाम को स्वीकार नहीं करते, तो तुम्हारा कर्तव्य केवल अल्लाह का संदेश पहुंचाना है, और अल्लाह अपने बंदों को देख रहा है।
وَمَنۡ يَّبۡتَغِ غَيۡرَ الۡاِسۡلَامِ دِيۡنًا فَلَنۡ يُّقۡبَلَ مِنۡهُ ۚ وَهُوَ فِى الۡاٰخِرَةِ مِنَ الۡخٰسِرِيۡنَ ﴿۸۵﴾
Q-03:85जो कोई इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, वह कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा, और परलोक में वह हानि उठाने वालों में से होगा।
ٰٓاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوا ادۡخُلُوۡا فِى السِّلۡمِ کَآفَّةً وَلَا تَتَّبِعُوۡا خُطُوٰتِ الشَّيۡطٰنِؕ اِنَّهٗ لَـکُمۡ عَدُوٌّ مُّبِيۡنٌ ﴿۲۰۸﴾
Q-02:208ऐ ईमान वालो! पूरी तरह से इस्लाम में दाखिल हो जाओ, और शैतान के पदचिह्नों का अनुसरण मत करो। बेशक, वह तुम्हारा खुला शत्रु है।
प्रत्येक नवजात जन्मजात मुस्लिम।
इस संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक बच्चा निर्दोष होता है और उसमें ईश्वर द्वारा सृजित स्वभाव होता है, जिसे अल्लाह सर्वशक्तिमान ने मनुष्यों के लिए निर्धारित किया है। वह स्वभाव है: सत्य और असत्य, अच्छे और बुरे में भेद करने की क्षमता। अर्थात्, प्रत्येक व्यक्ति किसी भी कार्य को करने से पहले जानता है कि वह अच्छा है या बुरा। ईश्वर की यह फितरत न कभी बदली है और न कभी बदलेगी।
इस मुद्दे को इस तरह भी समझा जा सकता है कि दुनिया का हर बहुदेववादी और नास्तिक जानता है कि सच्चा ईश्वर एक ही है। उदाहरण के लिए, किसी हिंदू से पूछिए कि कितने ईश्वर हैं? वह उत्तर देगा, "एक।" जबकि वह अनेक देवताओं की पूजा करता है। इसी प्रकार, किसी मुश्रीक (बहुदेववादी) से पूछिए कि कितने खुदा हैं? वह उत्तर देगा, "एक।" लेकिन उसकी आस्था पैगंबरों, दरगाहों और संतों-वलियों में ही टिकी रहती है। मनुष्य का स्वभाव है कि जैसे-जैसे उसकी शक्ति बढ़ती है, वह अविश्वास, बहुदेववाद और फ़ितनों में उलझता चला जाता है।
فَاَقِمۡ وَجۡهَكَ لِلدِّيۡنِ حَنِيۡفًا ؕ فِطۡرَتَ اللّٰهِ الَّتِىۡ فَطَرَ النَّاسَ عَلَيۡهَا ؕ لَا تَبۡدِيۡلَ لِخَـلۡقِ اللّٰهِ ؕ ذٰ لِكَ الدِّيۡنُ الۡقَيِّمُ ۙ وَلٰـكِنَّ اَكۡثَرَ النَّاسِ لَا يَعۡلَمُوۡنَ ۙ ﴿۳۰﴾
Q-30:30अतः सभी झूठे खुदाओं से दूर रहो और उस धर्म का अनुसरण करो जो ईश्वर का स्वरूप है और जिस पर उसने मनुष्य जाति की रचना की है। ईश्वर द्वारा सृजित प्रकृति में कोई परिवर्तन नहीं होता। यही सच्चा धर्म है, परन्तु अधिकांश लोग इसे नहीं जानते।
इस्लामी जीवन एक परीक्षा।
जब खुदा ने प्रथम मनुष्य आदम (As) को बनाया और उन्हे स्वर्ग में रखा, तो खुदा ने उनसे एक वचन लिया, कि वह इस विशेष वृक्ष का फल नहीं खाएगा, उसके अतिरिक्त वह स्वर्ग मे जहाँ से चाहे खाए। परन्तु आदम As ने उस वचन को तोड़ दिया। अथार्थ खुदा का परीक्षा लेना और इंसान का असफल होना तब आरंभ हुआ, जब इंसान ने धरती पर कदम भी नहीं रखा था।
وَقُلۡنَا يٰٓـاٰدَمُ اسۡكُنۡ اَنۡتَ وَزَوۡجُكَ الۡجَـنَّةَ وَكُلَا مِنۡهَا رَغَدًا حَيۡثُ شِئۡتُمَا وَلَا تَقۡرَبَا هٰذِهِ الشَّجَرَةَ فَتَكُوۡنَا مِنَ الظّٰلِمِيۡنَ ﴿۳۵﴾
Q-02:35हमने कहा, "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो, और जहाँ चाहो वहाँ से खाओ, लेकिन इस वृक्ष के पास न जाना, नहीं तो तुम दोनों घाटे में रहोगे।"
وَلَـقَدۡ عَهِدۡنَاۤ اِلٰٓى اٰدَمَ مِنۡ قَبۡلُ فَنَسِىَ وَلَمۡ نَجِدۡ لَهٗ عَزۡمًا ﴿۱۱۵﴾
Q-20:115और हमने आदम को पहले एक आदेश दिया था, किन्तु वह भूल गया और हमने उसमें कोई दृढ़ता नहीं पाई
लेकिन मनुष्य, जिसे ईश्वर ने अपने हाथों से रचा था। उसकी पहली ही परीक्षा में असफलता इस बात का संकेत थी कि मनुष्य कमज़ोर तत्वों का संग्रह है। इसलिए, ईश्वर ने मनुष्य के लिए दया को अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया। ईश्वर कहते हैं: यदि मनुष्य पश्चाताप करता है, तो वह मेरी दया से निराश नहीं होगा।
يُرِيۡدُ اللّٰهُ اَنۡ يُّخَفِّفَ عَنۡكُمۡۚ وَخُلِقَ الۡاِنۡسَانُ ضَعِيۡفًا ﴿۲۸﴾
Q-04:28अल्लाह तुम्हारे लिए चीज़ों को आसान बनाना चाहता है, और मनुष्य को कमज़ोर बनाया गया है।
كَتَبَ رَبُّكُمۡ عَلٰى نَفۡسِهِ الرَّحۡمَةَ ۙ اَنَّهٗ مَنۡ عَمِلَ مِنۡكُمۡ سُوۡٓءًۢا بِجَهَالَةٍ ثُمَّ تَابَ مِنۡۢ بَعۡدِهٖ وَاَصۡلَحَۙ فَاَنَّهٗ غَفُوۡرٌ رَّحِيۡمٌ ﴿۵۴﴾
Q-06:54रब ने स्वंम को दया (रहमत) करने का आदेश दे दिया है। फिर तुममें से जो कोई अज्ञानतावश कोई बुराई करे, फिर पलट आए और तौबा कर ले, तो निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।
قَالَ رَبِّ بِمَاۤ اَغۡوَيۡتَنِىۡ لَاُزَيِّنَنَّ لَهُمۡ فِى الۡاَرۡضِ وَلَاُغۡوِيَـنَّهُمۡ اَجۡمَعِيۡنَۙ ﴿۳۹﴾ اِلَّا عِبَادَكَ مِنۡهُمُ الۡمُخۡلَصِيۡنَ ﴿۴۰﴾ قَالَ هٰذَا صِرَاطٌ عَلَىَّ مُسۡتَقِيۡمٌ ﴿۴۱﴾ اِنَّ عِبَادِىۡ لَـيۡسَ لَكَ عَلَيۡهِمۡ سُلۡطٰنٌ اِلَّا مَنِ اتَّبَـعَكَ مِنَ الۡغٰوِيۡنَ ﴿۴۲﴾
Q-15:39-42(शैतान ने) कहा, "ऐ मेरे रब! जिस प्रकार तूने मुझे गुमराह किया है, उसी प्रकार मैं भी इनके लिए धरती की चीजों को आकर्षण का केंद्र बना दूँगा और उन्हें गुमराह कर दूँगा।" (39) परन्तु तेरे सच्चे बन्दों को। (उन पर काबू पाना बहुत कठिन है।) (40) अल्लाह ने कहा, "यही मेरा सीधा मार्ग है।" (41) निश्चय ही मेरे सच्चे बन्दों पर तेरा कोई अधिकार नहीं होगा, परन्तु उन लोगों पर जो गुमराही में तेरा अनुसरण करते हैं। (42)
وَلَوۡ شِئۡنَا لَاٰتَيۡنَا كُلَّ نَفۡسٍ هُدٰٮهَا وَلٰـكِنۡ حَقَّ الۡقَوۡلُ مِنِّىۡ لَاَمۡلَئَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الۡجِنَّةِ وَالنَّاسِ اَجۡمَعِيۡنَ ﴿۱۳﴾
Q-32:13और यदि हम चाहते तो प्रत्येक जीव को सदमार्ग दिखा सकते थे, किन्तु मेरा निश्चय हो चुका है कि मैं जहन्नम को समस्त जिन्नों और मनुष्यों से भर दूँगा।
खुदा फरमाता है कि मनुष्य का सांसारिक जीवन मात्र एक खेल और तमाशा है। यहाँ मौजूद धन, दरिद्रता, विलासिता और सुख-सुविधाएँ परीक्षा की भट्टियाँ हैं, जिनमें तपकर परलोक के लिए आवश्यक सामग्री इकट्ठा करना है। इसलिए, मनुष्य या तो अपने कर्मों को सीढ़ी बनाकर परलोक में स्थान प्राप्त कर सकता है, या वह नरक की भट्टी में दफ़न हो सकता है।
وَهُوَ الَّذِىۡ جَعَلَـكُمۡ خَلٰٓٮِٕفَ الۡاَرۡضِ وَرَفَعَ بَعۡضَكُمۡ فَوۡقَ بَعۡضٍ دَرَجٰتٍ لِّيَبۡلُوَكُمۡ فِىۡ مَاۤ اٰتٰٮكُمۡؕ اِنَّ رَبَّكَ سَرِيۡعُ الۡعِقَابِ وَاِنَّهٗ لَـغَفُوۡرٌ رَّحِيۡمٌ ﴿۱۶۵﴾
Q-06:165और वही है जिसने तुम्हें धरती पर तुम्हारा उत्तराधिकारी बनाया, और तुममें से कुछ को कुछ पर ऊँचा दर्जा दिया, ताकि वह तुम्हें उन चीज़ों में परख सके जो उसने तुम्हें दी हैं। बेशक, तुम्हारा रब जल्द सज़ा देने वाला है, और बेशक, वह क्षमा करने वाला और दयालु है।
وَمَا الۡحَيٰوةُ الدُّنۡيَاۤ اِلَّا لَعِبٌ وَّلَهۡوٌ ؕ وَلَـلدَّارُ الۡاٰخِرَةُ خَيۡرٌ لِّـلَّذِيۡنَ يَتَّقُوۡنَؕ اَفَلَا تَعۡقِلُوۡنَ ﴿۳۲﴾
Q-06:32सांसारिक जीवन तो बस खेल और तमाशा है और नेक लोगों के लिए आख़िरत का घर इससे कहीं बेहतर है। क्या तुम समझते नहीं?
اِنَّا خَلَقۡنَا الۡاِنۡسَانَ مِنۡ نُّطۡفَةٍ اَمۡشَاجٍۖ نَّبۡتَلِيۡهِ فَجَعَلۡنٰهُ سَمِيۡعًۢا بَصِيۡرًا ﴿۲﴾ اِنَّا هَدَيۡنٰهُ السَّبِيۡلَ اِمَّا شَاكِرًا وَّاِمَّا كَفُوۡرًا ﴿۳﴾
Q-76:02-03हमने मनुष्य को वीर्य की बूँद से पैदा किया, ताकि उसे परखें, फिर उसे सुनने और देखनेवाला बनाया (2) और हमने उसे (पैग़ंबरों के माध्यम से) मार्ग दिखाया, अब चाहे वह शुक्रगुजार बने या नाशुक्रा। (3)
इसीलिए खुदा ने आदम से कहा, "तुम आपस में एक-दूसरे के शत्रु होगे। किन्तु जब तुम्हारे पास मेरा रसूल मार्गदर्शन लेकर आएगा, तो तुममें से जो कोई मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण करेगा, वह न तो पथभ्रष्ट होगा और न यातना में डाला जाएगा। और जो कोई मेरे मार्गदर्शन से विमुख होगा, उसका परलोक कष्टमय होगा और हम उसे क़ियामत के दिन अन्धा करके उठाएँगे।
وَقُلۡنَا اهۡبِطُوۡا بَعۡضُكُمۡ لِبَعۡضٍ عَدُوٌّ ۚ وَلَـكُمۡ فِى الۡاَرۡضِ مُسۡتَقَرٌّ وَّمَتَاعٌ اِلٰى حِيۡنٍ ﴿۳۶﴾
Q-02:36और हमने कहा, "तुम सब लोग यहाँ से उतर जाओ। तुममें से कुछ लोग एक-दूसरे के शत्रु होंगे। और तुम्हारा धरती में एक निश्चित समय तक रहना और रोज़ी है।"
قُلۡنَا اهۡبِطُوۡا مِنۡهَا جَمِيۡعًا ۚ فَاِمَّا يَاۡتِيَنَّكُمۡ مِّنِّىۡ هُدًى فَمَنۡ تَبِعَ هُدَاىَ فَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُوۡنَ ﴿۳۸﴾ وَالَّذِيۡنَ كَفَرُوۡا وَكَذَّبُوۡا بِـاٰيٰتِنَآ اُولٰٓٮِٕكَ اَصۡحٰبُ النَّارِۚ هُمۡ فِيۡهَا خٰلِدُوۡنَ ﴿۳۹﴾
Q-02:38-39हमने कहा, "तुम सब लोग यहाँ से उतर जाओ। फिर जब मेरी ओर से तुम्हारे पास हिदायत आए, तो जो कोई मेरी हिदायत की पैरवी करेगा, उसके लिए न कोई डर होगा और न वह ग़मग़ीन होगा।" (38) और जिन लोगों ने इन्कार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वही लोग आग में पड़नेवाले हैं, और उसमें सदैव रहेंगे। (39)
पहली इस्लामिक मस्जिद का निर्माण।
शुरुआत में, इबादत का कोई ख़ास तरीक़ा नहीं था। ईश्वर ने इब्राहीम As और उनके बेटे इस्माईल As को बक्का (आज का मक्का) मे दुनिया की पहली मस्जिद, खाना ए काबा (मस्जिद हराम) बनाने का हुक्म दिया। खुदा ने उन्हें काबा की परिक्रमा करने, दान-पुण्य करने, ज़कात अदा करने और नमाज़ क़ायम करने का भी हुक्म दिया।
وَاِذۡ يَرۡفَعُ اِبۡرٰهٖمُ الۡقَوَاعِدَ مِنَ الۡبَيۡتِ وَاِسۡمٰعِيۡلُؕ رَبَّنَا تَقَبَّلۡ مِنَّا ؕ اِنَّكَ اَنۡتَ السَّمِيۡعُ الۡعَلِيۡمُ ﴿۱۲۷﴾ رَبَّنَا وَاجۡعَلۡنَا مُسۡلِمَيۡنِ لَـكَ ومِنۡ ذُرِّيَّتِنَآ اُمَّةً مُّسۡلِمَةً لَّكَ ومِنۡ ذُرِّيَّتِنَآ اُمَّةً مُّسۡلِمَةً لَّكَ وَاَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبۡ عَلَيۡنَاۚ اِنَّكَ اَنۡتَ التَّوَّابُ الرَّحِيۡمُ ﴿۱۲۸﴾
Q-02:127-128और (याद करो) जब इबराहीम और इस्माईल खुदा के घर की नींव रख रहे थे और दुआ कर रहे थे "ऐ हमारे रब! हमारी यह खिदमत स्वीकार कर। बेशक तू ही सब कुछ सुननेवाला, और जाननेवाला है।" (127) ऐ हमारे रब! हमें अपने रब के सामने सिर झुकाने वाला बना, और हमारी नस्ल में से एक ऐसी क़ौम पैदा कर जो तेरी फरमाबरदार हो। और हमें इबादत का तरीक़ा सिखा, और हमारी तरफ़ देख। बेशक तू बड़ा मेहरबान, तौबा क़बूल करनेवाला है। (128)
وَاِذۡ جَعَلۡنَا الۡبَيۡتَ مَثَابَةً لِّلنَّاسِ وَاَمۡنًا﯀ وَاتَّخِذُوۡا مِنۡ مَّقَامِ اِبۡرٰهٖمَ مُصَلًّى ؕ وَعَهِدۡنَآ اِلٰٓى اِبۡرٰهٖمَ وَاِسۡمٰعِيۡلَ اَنۡ طَهِّرَا بَيۡتِىَ لِلطَّآٮِٕفِيۡنَ وَالۡعٰكِفِيۡنَ وَالرُّکَّعِ السُّجُوۡدِ ﴿۱۲۵﴾
Q-02:125और (वो समय याद करो) जब हमने खाना ए काबा को, लोगों के लिए सुरक्षित (अमन का) स्थान और जमावड़ा स्थल बनाया और मुकाम ए इबराहीम को नमाज़ का स्थान बना लो। और हमने इबराहीम और इसमाईल को आदेश दिया कि मेरे घर (काबा) को उन लोगों के लिए पवित्र रखो जो उसकी परिक्रमा करते हैं, और एतिकाफ़ करते हैं, और रुकू और सजदा करते हैं।
इस्लाम? इब्राहीम (As) का दीन (धर्म)।
मुहम्मद का इस्लाम इब्राहीम As (अब्राहम) का दीन (धर्म) है। वह दीन जो खुदा ने इब्राहीम को सिखाया था। वही मिल्लत (तरीका ए दीन) पैगंबर मुहम्मद Saw पर ईश्वरीय प्रकाश के माध्यम से नाज़िल (प्रकट) हुआ था। और जिस क़िबला (काबा) का निर्माण इब्राहीम As और इस्माइल As ने तत्कालीन शहर बक्का (आज का मक्का) में किया था। जो उनके लिए और दुनिया के लिए पहली मस्जिद थी। आज, यह इस्लाम में विश्वास रखने वाले सभी मुसलमानों का क़िबला है।
ثُمَّ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ اَنِ اتَّبِعۡ مِلَّةَ اِبۡرٰهِيۡمَ حَنِيۡفًا ؕ وَمَا كَانَ مِنَ الۡمُشۡرِكِيۡنَ ﴿۱۲۳﴾
Q-16:123फिर हमने आपﷺ की तरफ वहीय भेजी कि आप इब्राहीम As के दीन की पैरवी करो, जो धर्मनिष्ठ थे। और वे मुशरीकों में से नहीं थे।
قُلۡ صَدَقَ اللّٰهُ فَاتَّبِعُوۡا مِلَّةَ اِبۡرٰهِيۡمَ حَنِيۡفًا﯀ وَمَا كَانَ مِنَ الۡمُشۡرِكِيۡنَ ﴿۹۵﴾ اِنَّ اَوَّلَ بَيۡتٍ وُّضِعَ لِلنَّاسِ لَـلَّذِىۡ بِبَكَّةَ مُبٰرَكًا وَّهُدًى لِّلۡعٰلَمِيۡنَۚ ﴿۹۶﴾ فِيۡهِ اٰيٰتٌ ۢ بَيِّنٰتٌ مَّقَامُ اِبۡرٰهِيۡمَ ۚ وَمَنۡ دَخَلَهٗ كَانَ اٰمِنًا ؕ ﴿۹۷﴾
Q-03:95-97कहो: अल्लाह ने सत्य कहा है, इसलिए इब्राहीम के दीन का अनुसरण करो, जिन्होंने असत्य को छोड़कर सीधे अल्लाह की ओर रुख किया, और वे बहुदेववादियों में से नहीं थे। (95) निःसंदेह, मानवजाति के लिए नियुक्त पहला घर बक्का में है, जो धन्य है। और संसार के लिए मार्गदर्शन है। (96) उसमें स्पष्ट निशानियाँ हैं, जैसे इब्राहीम का स्थान। और जो कोई उसमें प्रवेश करता है, वह सुरक्षित हो जाता है। (97)
وَمَنۡ اَحۡسَنُ دِيۡنًا مِّمَّنۡ اَسۡلَمَ وَجۡهَهٗ لِلّٰهِ وَهُوَ مُحۡسِنٌ وَّاتَّبَعَ مِلَّةَ اِبۡرٰهِيۡمَ حَنِيۡفًا ؕ وَاتَّخَذَ اللّٰهُ اِبۡرٰهِيۡمَ خَلِيۡلًا ﴿۱۲۵﴾
Q-04:125और दीन में उससे अच्छा कौन हो सकता है जो अपने पूरे वजूद को खुदा के हवाले कर दे, अच्छे कर्म करे और इब्राहीम की मिल्लत (तरीके) का अनुसरण करे, जिन्होंने प्रत्येक झूट से किनारा करके खुदा की तरफ ध्यान केंद्रित किया। और खुदा ने इब्राहीम को अपना विशेष मित्र बनाया था।
قُلۡ اِنَّنِىۡ هَدٰٮنِىۡ رَبِّىۡۤ اِلٰى صِرَاطٍ مُّسۡتَقِيۡمٍ ۚ دِيۡنًا قِيَمًا مِّلَّةَ اِبۡرٰهِيۡمَ حَنِيۡفًا ۚ وَمَا كَانَ مِنَ الۡمُشۡرِكِيۡنَ ﴿۱۶۱﴾
Q-06:161ऐ नबी! कह दो, "मेरे रब ने मुझे सीधा मार्ग दिखाया है, एक ऐसे धर्म की ओर जो सीधा और दृढ़ है, वह इब्राहीमAs का धर्म है, जिन्होंने प्रत्येक झूट से किनारा करके खुदा की तरफ ध्यान केंद्रित किया। और वह मुश्रिकों में से न थे।
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